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महाराजगंज

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (RSS) डॉ जावेद अख्तर को बनाया गया जिला संयोजक युवा प्रकोष्ठ

महराजगंज जिले में लोगो को अलग अलग पदों पर दी गयी जिम्मेदारियां।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (आरएसएस) जिला- महराजगंज में कि गयी टीम गठित।

आप को बताते चलें कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को

24 दिसंबर, 2002 को राष्ट्रवादी मुसलमानों का एक समूह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पदाधिकारी दिल्ली में एक साथ आए। मौका था ईद मिलन का और यह कार्यक्रम मशहूर पत्रकार, लेखक और विचारक पद्मश्री मुजफ्फर हुसैन और उनकी पत्नी नफीसा, जो उस समय दिल्ली में राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य थीं, की पहल पर आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में तत्कालीन आरएसएस सरसंघचालक केएस सुदर्शन, आरएसएस विचारक एमजी वैद्य, आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार, मदन दास, ऑल इंडिया इमाम काउंसिल के अध्यक्ष मौलाना जमील इलियासी, मौलाना वहीदुद्दीन खान, फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुकर्रम, सूफी मुस्लिम शामिल हुए थे। , शिक्षाविद् और अन्य बुद्धिजीवी। चर्चा का मुख्य मुद्दा स्वाभाविक रूप से यह था कि भारत में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच बढ़ती खाई को कैसे पाटा जाए। चर्चा की शुरुआत करते हुए सुदर्शन ने कहा कि दुनिया ने इस्लाम की हिंसा ही देखी है. लेकिन इसका दूसरा चेहरा भी है- शांति का. क्या दुनिया को इस्लाम का यह दूसरा चेहरा दिखाने की कोशिशें होंगी?

उन्होंने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि भारत में मुसलमानों ने अल्पसंख्यक दर्जा क्यों स्वीकार किया, जबकि वे जन्म से इस भूमि के निवासी थे और उनकी संस्कृति, नस्ल और पूर्वज हिंदुओं के साथ समान थे? उनके सवालों ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों और मौलानाओं के बीच हलचल पैदा कर दी और महसूस किया गया कि उन्हें इन सवालों के संतोषजनक जवाब देने के लिए नए सिरे से प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार, दोनों समुदायों को करीब लाने के लिए सोचने की प्रक्रिया शुरू हुई। आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार ने इस प्रक्रिया में एक सूत्रधार की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आतंकवाद के चरम दिनों के दौरान वह जम्मू-कश्मीर में आरएसएस के प्रांतीय आयोजक थे। हिंदू-मुस्लिम विभाजन की समस्या पर अपना दिमाग लगाते हुए, इंद्रेश कुमार इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि महात्मा गांधी और हिंदू महासभा द्वारा अपनाए गए पहले के दो दृष्टिकोण इस अंतर को पाटने में विफल रहे क्योंकि वे असंतुलित थे। गांधीजी ने मुसलमानों को संतुष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और हिंदू महासभा ने नफरत और अलगाववाद के मुद्दे को बढ़ाया जिसके परिणामस्वरूप दोनों दृष्टिकोण विफल हो गए। तो तीसरे रास्ते की जरूरत थी और वो तीसरा रास्ता इंद्रेश कुमार द्वारा निकाला गया राष्ट्रवाद का रास्ता था.

इंद्रेश कुमार का मानना था कि जब हमारे पूर्वज, संस्कृति और मातृभूमि एक ही है तो टकराव की गुंजाइश कहां रह जाती है? एक बार जब मुसलमान और हिंदू भारत की भावना और आत्मा को समझ लेंगे और महसूस कर लेंगे, तो सभी कृत्रिम बाधाएं अपने आप दूर हो जाएंगी। इस प्रकार, आरएसएस नेताओं की पहल पर मुसलमानों और हिंदुओं के बीच समझ और संवाद की नई प्रक्रिया शुरू हुई। नए आंदोलन को शुरू में “राष्ट्रवादी मुस्लिम आंदोलन-एक नई राह” कहा जाता था, जिसे 2005 में “मुस्लिम राष्ट्रीय मंच” के रूप में पुनः नामित किया गया था। तब से वापस नहीं जाना पड़ा। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने भारतीय मुसलमानों के बीच एक नए युग की शुरुआत की। उनमें एक नई सोच उभरी है जो अब अपने भविष्य को इस देश के भविष्य से जोड़ते हैं। इससे आरएसएस की छवि कट्टर, सांप्रदायिक,
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जिसमे अस्थपना के दौरान इंद्रेस कुमार और रामलाल जी के साथ साथ तमाम वरिष्ठ आरएसएस के पदाधिकारी भी मौजूद थे।

महताब खान सह संयोजक पूर्वी उत्तर प्रदेश – मुस्लिम राष्ट्रीय मंच
के द्वारा नियुक्त जिला- महराजगंज में किये गए ।
1. जिला संयोजक- नूर आलम को बनाया गया तो वही
2- मुन्ना अंसारी को राष्ट्रीय मुस्लिम मंच (आरएसएस) के जिला मीडिया प्रकोष्ठ बनाया गया
3- अहमद रजा को जिला सह संयोजक का पद सौंपा गया।
4- मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (आरएसएस) के शम्स तबरेज़ खान को जिला संयोजक सेवा प्रकोष्ठ का पद दिया गया।
5- मदरसा शिक्षा प्रकोष्ठ मौलाना अब्बास अली नूरी को बनाया गया।
6- तफ़ज़्ज़ुल अंसारी जिला- सह संयोजक राष्ट्रीय मुस्लिम मंच
7- इरफान अहमद को राष्ट्रीय मुस्लिम मंच (आरएसएस) के जिला संयोजक युवा प्रकोष्ठ के पद सौंप कर जिम्मेदारियों से नवाजा गया ताकि सभी अपने अपने जिम्मेदारी को ईमानदारी के साथ निभाएं।

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